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गुंडों बदमाशों से लैस है जिले के नर्सिगहोम, इलाज के नाम पर लुटते है मरीजों को

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विनय कुमार मिश्र, गोरखपुर ब्यूरों।
एक मरीज बड़ी आशा और विश्वास लेकर किसी डॉक्टर के पास जाता है कि वह ठीक हो जाएगा और उसकी जिंदगी सही सलामत बच जाएगी लेकिन सोचिए जरा जैसे ही उसे यह पता चले कि वह जिससे इलाज करा रहा है या जो उसका इलाज कर रहा है वह प्रशिक्षित डॉक्टर है, उसे किसी प्रकार का अनुभव और डिग्री प्राप्त नहीं है तो क्या होगा ? मरीज के पैर के नीचे से जमीन खिसक जाएगी न ? क्या आपको यह झूठा लग रहा है तो सुनिए जिले में कुकुरमुत्ते की तरफ खुले  चिकित्सालय, नर्सिंगहोम, पैथालोजी सेंटर शहर से लेकर गांव तक खुल रहे हैं जिनका मूल मकसद मरीजों,तीमारदारों की जेब पर डाका डालना होता है । क्या इनके सभी प्रशिक्षित व अनुभवी कर्मचारी है?  इन जगहों पर हाईस्कूल पास लोग काम करते हैं जो यहाँ स्टाफ नर्स, फार्मेसिस्ट, वार्डव्बाय आदि होते हैं। इनके पास इनके कार्य के हिसाब की कोई डिग्री या डिप्लोमा नहीं होता है। ऐसे में मरीज का इलाज क्या होता होगा आसानी से समझा जा सकता है? ऐसी ही एक घटना शनिवार को घटित हो गई । जिले के पैड़लेगंज स्थित राजवंशी नर्सिंगहोम में  देखने को मिली। मालूम हो कि झंगहा के नईबाजार के मिठाबेल निवासी सचिन दूबे (25) 14 अप्रैल को गोरखपुर से अपने गांव जाते समय रास्ते में सांड से टकराकर घायल हो गए जिन्हे राजवंशी नर्सिंगहोम में भर्ती कराया गया। शनिवार को युवक की तबियत खराब होने लगी तो परिजनों ने कर्मचारी से डॉक्टर को बुलाने का अनुरोध किया । लेकिन कर्मचारियों ने परिजनों का अनुरोध अनसुना कर दिया  जिससे सचिन दुबे की मौत हो गई । यही नहीं हद तो तब हो गई जब परिजन इलाज में लापरवाही का आरोप लगाने लगे तब नर्सिंग होम कर्मचारियों व डॉक्टर के गुर्गो ने मिलकर  परिजनों को मन भर पीटा। मृतक के भाई अमित कुमार दुबे की तहरीर पर मुकदमा तो दर्ज कर लिया गया है लेकिन  सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या इंसाफ हो पाएगा ? एक बात समझ में नहीं आती है कि नर्सिंगहोम, प्राइवेट अस्पताल, पैथोलॉजी सेंटर वाले सारे नियमों को ताख पर रखकर  संचालित हो रहे है मगर जिम्मेदार आंख मूंदे हुए  है जिससे किसी निर्दोष की जान तक चली जा रही है । जब इस नर्सिगहोम की असलित पता कि गई तो पता चला कि एक साल पहले 12 मार्च 2018 को जीडीए ने इसे सील किया था लेकिन नर्सिगहोम वालों ने हिलाहवाली करके कुछ हिस्सों को ही सिल कराया और यही लापरवाही सचिन दूबे की जान ले ली।मालुम हो कि बहुत से नर्सिगहोम,अस्पताल, पैथालोजी सेंटर सारे नियमों कानुनों को ताख पर रख कर इलाज कर रहे है, यही नही ये मरीजों की जेब पर डाका डालने का लाइसेंस भी ले चुके है।समझ में नही आ रहा है कि आखिर ये नर्सिंगहोम कब तक किसी निर्दोष की जान लेते रहेगे व मरीजों की जेब पर डाका डालते रहेगें?

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