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चीन के नापाक इरादों से हालात बेहद खराब

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नई दिल्ली (एजेंसी)। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी तनातनी अंतत: खूनी संघर्ष में तब्दील हो गई। गलवां घाटी में भारत का सड़क बनाना चीन को पच नहीं रहा है, हालांकि यह सड़क पूरी तरह भारतीय सीमा है। ‘मुंह में राम बगल में छुरी के लिए मशहूर चीनियों ने हर मौके पर दोहरी चाल चली। एक ओर चीन के नेता बातचीत का राग अलापते हैं, तो दूसरी ओर उसके सैनिक अचानक हमला कर देते हैं। इस बार भी चीन लगातार बातचीत से विवाद के हल का ढिंढोरा पीट रहा था, लेकिन सोमवार की रात उसने अपना चरित्र दिखा दिया।
जिस गलवां घाटी में तनाव के बाद भारत और चीन के बीच 1962 में युद्ध की नौबत आई, उसी गलवां घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हिंसक झड़प हुई। दरअसल, गलवां घाटी सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से चीन को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर एकतरफा बढ़त लेने से रोकती है। यही कारण है कि चीन अरसे से इस घाटी पर निगाह जमाए बैठा था। 1962 की जंग में गलवां घाटी में गोरखा सैनिकों की पोस्ट को चीनी सेना ने 4 महीने तक घेरे रखा था। इस दौरान 33 भारतीयों की जान गई थी। यह घाटी चारों तरफ से बर्फीली पहाडिय़ों से घिरी है।
पहाड़ देते हैं भारतीय सैनिकों को बढ़त
घाटी के दोनों तरफ के पहाड़ भारतीय सैनिकों को बढ़त देते हैं। इसी घाटी में श्योक और गलवां नदियों का संगम होता है। साल 1962 के युद्ध में चीन ने अपने दावे से अधिक हिस्से पर कब्जा कर लिया। इसके बावजूद यह घाटी उसकी पहुंच से दूर थी।
चीन चाहता है कि शिनजियांग और तिब्बत के बीच बना राजमार्ग जी 219 तक भारत की आसान पहुंच नहीं हो। इस राजमार्ग का 179 किलोमीटर हिस्सा अक्साई चिन में है, जिस पर चीन का कब्जा है।
भारत ने इस घाटी में पहले ही बना ली थी चौकी
मुश्किल यह है कि सामरिक दृष्टि से अहम होने के कारण भारत ने चीन से युद्ध से पहले ही इस घाटी में चौकी बना ली थी। इसी चौकी और गलवां घाटी से भारतीय सेना की सामरिक दृष्टि से बेहद अहम सड़क गुजरती है, जो दौलत बेग ओल्डी तक जाती है।
1956 से कब्जे का दावा करता आ रहा चीन
गलवां घाटी अक्साई चिन क्षेत्र में है। इसके पश्चिम इलाके पर 1956 से चीन अपने कब्जे का दावा करता आ रहा है। 1960 में अचानक गलवां नदी के पश्चिमी इलाके, आसपास की पहाडिय़ों और श्योक नदी घाटी पर चीन अपना दावा करने लगा। लेकिन भारत लगातार कहता रहा है कि अक्साई चिन उसका इलाका है। इसके बाद ही 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ था।
उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल सीमा पर भी तनाव
दोनों देशों के बीच लद्दाख के बाद उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल से लगती सीमा पर भी तनाव बरकरार है। सिक्कम में भी बीते महीने दोनों देशों की सेनाओं के बीच एलएसी पर झड़प हुई थी।
भारत ने भेजी फौज की अतिरिक्त टुकड़ी
उत्तराखंड में नेलांग घाटी में वर्ष 1962 में दोनों देशों के बीच जबरदस्त भिड़ंत हुई थी। अब लद्दाख में झड़प के बाद उत्तराखंड से लगे एलएसी पर तनाव के मद्देनजर भारत बेहद सतर्क है। चीन ने नेलांग घाटी की दूसरी ओर बने एयरबेस पर लड़ाकू विमान तैनात किए हैं। जवाब में भारत ने भी एलएसी पर फौज की अतिरिक्त टुकडिय़ों की तैनाती की है।
अलर्ट पर सेना
अरुणाचल प्रदेश में भी एलएसी पर भारी तनाव है। यहां ईस्टर्न सेक्टर में हालात पर नियंत्रण के लिए भारत ने माउंटेन स्ट्राइक कोर को तैनात किया है। एलएसी की दूसरी तरफ चीनी सैनिकों के बढ़ते जमावड़े की सूचना के बाद भारत ने सुकना के 33 कोर, तेजपुर के 4 कोर और रांची स्थित 17 माउंटेन स्ट्राइक कोर को अलर्ट मोड पर रखा है। उत्तरी सिक्किम स्थित नाकूला सेक्टर में दोनों देश के सैनिकों के बीच बीते महीने झड़प हुई थी। झड़प में दोनों तरफ के सैनिकों को मामूली चोटें भी आई। हालांकि, इसे स्थानीय स्तर पर हस्तक्षेप के बाद सुलझा लिया गया। मगर इसके बाद से दोनों ही ओर से एलएसी पर सैनिकों का जमावड़ा बढ़ गया है। वर्ष 2017 में भी दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। तब दोनों ही ओर के शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने दखल दे कर स्थिति शांत की थी। फिलहाल तनाव की स्थिति बनी हुई है।

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