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तालाब से शवयात्रा, गांव को मिल गया श्मशान का रास्ता

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राजीव उपाध्याय, अतुल शुक्ला जबलपुर(न.डी) । ब्यूरो स्वतंत्रता के 70 साल बाद भी जबलपुर से महज 22 किमी दूर एक गांव ऐसा है जहां गांव से श्मशान तक जाने के लिए रास्ता तक नहीं है। बरसों से इस गांव के लोग तालाब के किनारे से शव यात्रा निकालते रहे हैं और नए रास्ते की मांग करते हैं लेकिन आवाज दबी ही रही। गुरुवार को एक वृद्धा कांति बाई की मौत के बाद इस समस्या का हल निकला।
कांतिबाई की शवयात्रा तालाब से इस तरह निकली कि उसमें शामिल गांव वालों की छाती तक पानी आ गया। इसके बाद यह तस्वीर जब मीडिया में आई तो शासन और प्रशासन में हड़कंप की स्थिति मच गई। मामला पीपली लाइव (चर्चित फिल्म) की तरह ही हुआ।
दूसरे दिन शुक्रवार को क्षेत्रीय विधायक के साथ पूरा प्रशासनिक अमला और मीडिया गांव पहुंच गया और मौके पर ही महज आधे घंटे में गांव से श्मशानघाट तक जाने का रास्ता बनाने का निर्णय लिया और उस पर अमल भी शुरू हो गया। सीमांकन, पेड़ कटा पनागर के पास ग्राम बैहर में श्मशानघाट जाने के लिए अब ग्रामीणों को तालाब के बीच से नहीं जाना पड़ेगा।
शुक्रवार को क्षेत्रीय विधायक सुशील तिवारी, जिला पंचायत अध्यक्ष मनोरमा पटेल, एसडीएम मिनिषा जायसवाल, जिला पंचायत सीईओ हर्षिका सिंह, पटवारी रोशनी मांझी मौके पर पहुंची। तेजी के साथ मौके पर ही निर्णय लिए और सरकारी जमीन के बाद निजी भूमि मालिक नलिन शर्मा भी अपने खेत के कुछ हिस्से को दान करने के लिए राजी हो गए। मौके पर ही दान पत्र पर हस्ताक्षर करवाए, सीमांकन किया और रास्ते में आने वाला पेड़ भी काट दिया।
मैं तो था ही नहीं
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कांतिबाई की शवयात्रा का रास्ता रोकने और तालाब से शवयात्रा निकलने के मामले के आरोपों पर चर्चा में आए नलिन का कहना है कि मुझ पर झूठे आरोप लगाए गए हैं कि मैंने रास्ता रोका है जबकि मैं गांव में ही नहीं था। तालाब के ऊपरी हिस्से की जमीन मेरी थी, फिर भी विधायक के निर्देश पर मैंने उसे दान कर कर दिया है। शासन ने जमीन का नाप भी कर लिया है। नलिन शर्मा का आरोप है कि शवयात्रा को तालाब से निकालने का ट्रायल किया गया और मुझ पर आरोप भी प्रायोजित हैं।

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