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एक शिक्षक के जुनून ने बदल दी पतरातू के सरकारी स्कूल की सूरत

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रामगढ़: रामगढ़ जिले के पतरातू प्रखंड के भाग दो के अंतर्गत पहाड़ की तलहटी में एक विद्यालय सबका ध्यान खींच लेता है. हरे-भरे पेड़ों और बाग-बगीचों के बीच बच्चों के कोलाहल से प्रभावित हुए बगैर कोई नहीं रह पाता. बरकाकाना से वाया कंडेर टायर मोड़ के लिए जानेवाली ग्रामीण सड़क के किनारे ग्राम सिऊर में अवस्थित इस प्राइमरी स्कूल की तकदीर तब बदली, जब 14 वर्ष पूर्व बरकाकाना मध्य विद्यालय से प्रदीप रजक को यहां भेजा गया. प्रदीप अब इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक हैं. विद्यालय में वे एकमात्र सरकारी शिक्षक हैं. उनकी सहायता के लिए आसपास के गांव से बहाल हुए आठ पारा शिक्षक हैं, जो इनके साथी बन चुके हैं. सबके प्रयास से स्कूल निरंतर प्रगति के पथ पर है. बकौल प्रदीप, जब उन्होंने विद्यालय में योगदान दिया, उपस्थिति पंजिका में 50 से भी कम बच्चे थे. मुश्किल से 8-10 बच्चे स्कूल आते थे. प्रदीप ने सबसे पहले बच्चों के स्कूल न आने का कारण ढूंढ़ना शुरू किया. गांववालों के साथ बैठक की. हर घर में जाकर बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रेरित किया. कुछ महीनों में ही प्रयास रंग लाया. देखते ही देखते विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति 90 प्रतिशत हो गयी. यहां से स्कूल के विकास का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज भी जारी है. वर्ष 1962 से पांच डिसमिल जमीन पर बने स्कूल के पास आज 60 डिसमिल जमीन है. इसमें 20-25 डिसमिल पर भवन बन चुका है. कुछ निर्माण जारी हैं. सबसे पहले वर्ष 2004 में इस स्कूल को उत्क्रमित कर मिडिल स्कूल बनाया गया. फिर बच्चों की बढ़ती तादाद को देखते हुए वर्ष 2011-12 में इसे उत्क्रमित कर उच्च विद्यालय बना दिया गया. आज पतरातू प्रखंड पूर्वी क्षेत्र में सिऊर का यह स्कूल मॉडल उत्क्रमित उच्च विद्यालय सिऊर के रूप में जाना जाता है. हालांकि, जिला प्रशासन ने मॉडल स्कूल तो बना दिया, लेकिन मॉडल स्कूल की कोई भी सुविधा इस विद्यालय को मयस्सर नहीं हुई. विद्यालय में नियमित मध्याह्न भोजन चलता है. योग, कराटे, फुटबॉल, क्रिकेट, वॉलीबॉल, बैडमिंटन जैसे खेलों का भी संचालन होता है. सांस्कृतिक कार्यक्रम भी नियमित रूप से होते हैं. इतना ही नहीं, बाल संसद के माध्यम से छात्र-छात्राओं को देश-दुनिया की जानकारी दी जाती है. स्कूल में स्वच्छता का विशेष ख्याल रखा जाता है. यह कार्य शिक्षक व छात्र मिल कर करते हैं. विद्यालय में शौचालय एवं पेयजल की उत्तम व्यवस्था है. शौचालय में नि:शक्त बच्चों के लिए स्टील हैंडल भी लगे हैं. वहीं, स्वच्छता की दृष्टि से निल के पास आइना, साबुन, तौलिया रखे गये हैं. ये तमाम संसाधन प्रधानाध्यापक स्थानीय लोगों के सहयोग से जुटाते हैं. विद्यालय के भवन निर्माण में किसी भी तरह की कटौती न कर उससे बची राशि भी विद्यालय में ही लगा देते हैं. विद्यालय परिसर का भ्रमण करने के बाद आप भी यही कहेंगे कि इनसान अगर कुछ करने की ठान ले, तो सरकारी उदासीनता भी उसके मार्ग में कोई बाधा खड़ी नहीं कर सकती. मिला सम्मान प्रखंड स्तर, जिला स्तर, अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस 2015 पर सुदेश महतो के हाथों हुए पुरस्कृत. विद्यालय में 99 प्रतिशत तक रहती है उपस्थिति. ग्राम शिक्षा समिति का मिलता है पूरा सहयोग.

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