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नवरात्रि के सातवें दिन होती है सारे डर को दूर करने वाली मां कालरात्रि की पूजा

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नवरात्र की सातवीं शक्ति का नाम है कालरात्रि। मां कालरात्रि यंत्र, मंत्र और तंत्र की देवी हैं। भगवान शंकर ने एक बार देवी को काली कह दिया, कहा जाता है, तभी से इनका एक नाम काली भी पड़ गया। दानव, भूत, प्रेत, पिशाच आदि इनके नाम लेने मात्र से भाग जाते हैं। यह सदैव शुभ फल देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम शुभकारी भी है। लगाया जाता है मां को गुड़ का भोग: कहा जाता है कि मां गुड़ का भोग लगाने से प्रसन्न हो जाती हैं। इसलिए सप्तमी को मां कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाना चाहिए। भोग लगाने के बाद गुड़ का आधा हिस्सा परिवार में बांटना चाहिए और बाकि ब्राह्मण को देना चाहिए। ये है मां कालरात्रि की उत्पत्ति की कहानी कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में कोहराम मचा रखा था। इसी बात से चिंतित सभी देवतागण भगवान शिव जी के पास गए और उनसे रक्षा करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने माता पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने को कहा। भगवान शिव की बात मानकर माता पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया। लेकिन जैसे ही मां दुर्गा ने दैत्य रक्तबीज को मारा उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज दैत्य उत्पन्न हो गए। इसे देख दुर्गा जी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया। इसके बाद जब मां दुर्गा ने दैत्य रक्तबीज का वध किया तो उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को मां कालरात्रि ने जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया इस तरह मां दुर्गा ने सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया।

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