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रावण ने दस सिरों की बलि, दशहरे पर नहीं जलता लंकेश का पुतला

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रावण ब्रह्म ज्ञानी, कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और कई विद्याओं का जानकार था। बताया जाता है कि रावण ने भगवान को शिव को प्रसन्न करने के लिए भोलेनाथ के इस मंदिर में भगवान कई सालों तपस्या की थी। यहां हम आपको बताने जा रहे हैं हिमालय के धर्मशाला में धौलधर पर्वत पर बसे बैजनाथ धाम के बारे में। इस जगह रामलीला का आयोजन होता है लेकिन यहां लोग दशहरा नहीं मनाते। कांगड़ा के बैजनाथ धाम में भगवान शिव का एक शिवलिंग है। मान्यताओं के अनुसार लंका का राजा रावण भगवान शिव का सबसे बड़ा भक्त था। उसने कई सालों भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहां तपस्या की थी। जब शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न नहीं हुए तो रावण ने अपने सिर काटकर भगवान शिव को समर्पित कर दिए थे। जैसे ही रावण अपना दसवां सिर काटकर भगवान शिव के चरणों में रखने जा रहा था तभी उसके समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने रावण को अपराजयता और अमरत्व का वरदान दिया था। इस मंदिर में आज भी रावण की चरण पादुका और हवनकुंड स्थापित है जहां रावण ने अपने दसों सिरों की बलि दी थी। लोगों के अनुसार यहां रामलीला का आयोजन तो होता है लेकिनयहां रावण का पुतला नही मजलाया जाता। कहते हैं कि जो दशहरे की इस परंपरा में शामिल होता है उसकी अप्राकृतिक मृत्यु हो जाती है।

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