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गेंगवार में घायल बालक एक साल से जूझ रहा है मौत से,सूरत की वह खूनी दीवाली

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सूरत। वराछा के धरमनगर रोड पर पिछले साल पटाखों की गूंज के बीच गेंगवार हुआ था। इस दौरान हुई फायरिंग में दो मासूमों को भी गोली लगी। इसमे से एक की मौत हो गई, पर दूसरे की जिंदगी एक साल से मौत से जूझ रही है। पूरा परिवार टूट गया है। फिर भी उन्हें आशा है कि एक दिन वह मासूम अपने पांव पर खड़ा होगा।गेंगवार में निर्दोष हुए शिकार सूरत में पिछले साल दिवाली की रात (11 नवम्बर) को गेंगवार हुआ था। यह गेंगवार मनीष कुकरी और वसुंधरा गेंग के बीच हुआ था। दोनों के साथी आमने-सामने आ गए। मनीष कुकरी और उसके दो साथी राधे इलेक्ट्रिक के पास डेनिश खत्री पर अंधाधुंध फायरिंग की थी। फायरिंग से बचने के लिए डेनिश इधर से उधर भाग रहा था। हमलावर उसके पीछे पड़े थे। इस दौरान कुछ गोलियां डेनिश पर चलाई गई, इसमे डेनिश तो बच गया, पर वह गोलियां वहां पास की क्षमा सोसायटी में रहने वाले दो दोस्त निकुंज वेकरिया और यश जीयाणी सोडा पीने आए, उन्हें लगी। दोनों बुरी तरह से घायल हो गए। इलाज के दौरान यश की मौत हो गई। पर निकुंज कोमा में चला गया। वह आज भी बिस्तर पर है।
आखिर तक लड़ूंगी-निकुंज की मां अपने बेटे की पीड़ा बताते हुए निकुंज की मां लीला बेन कहती है कि घर में कमाने वाले चार लोग हैं, ये सब मिलकर निकुंज को पढ़ाते थे। निकुंज कोमा में चला गया, पर पूरा परिवार वहीं अटक गया। एक साल हो गया, पर हमने हिम्मत नहीं हारी है। निकुंज पर हुई फायरिंग से हमारे जीवन में अंधेरा पसर गया।
परिवार आर्थिक रूप से टूट गया निकुंज की मां ने बताया कि निकुंज पर हुई फायरिंग से मेरा निर्दोष बेटा पेरालिसीस का शिकार हो गया। अब उसे हमेशा बिस्तर पर ही अपने दिन गुजारने होते हैं। वह इशारों में बात करता है। उसकी आंखें हमेशा गीली रहती हैं। पूरा परिवार बिखर गया है। हम आर्थिक रूप से टूट गए हैं। पर हिम्मत नहीं हारी है। हमें अभी भी आशा है कि एक दिन हमारा निकुंज अपने पांव पर खड़ा होगा। बेटे की पीड़ा नहीं देख सकता-पिता निकुंज के पिता हंसमुख भाई वेकरिया ने बताया कि एक साल से नौकरी नहीं कर पा रहा हूं। बड़े बेटे की आय से घर चल रहा है। बिस्तर पर पड़े निकुंज के लिए रोज फिजियोथेरेपी के लिए आने वाले डॉक्टर को 800 रुपए देने होते हैं। इसके अलावा महंगी दवाएं भी, इस तरह से हर महीने उस पर 30 हजार रुपए खर्च हो रहे हैं। इसके बाद भी वह पीड़ा से मुक्त नहीं हो पाया है। उसकी पीड़ा देखी नहीं जाती। मित्रों से कुछ आर्थिक मदद होती है। बाकी सब भगवान भरोसे छोड़ दिया है।
जन्म दिन के पहले ही मौत गेंगवार में फायरिंग से जिस यश की मौत हो गई, उसकी दादी ललिता बेन ने बताया कि यश को साइंस लेना था। पर घर की माली हालत ठीक नहीं थी, तो 11वीं मे उसे कामर्स लेना पड़ा। वह बार-बार कहता कि मुझे साइंस पढ़ने दो, मैं जल्द ही नौकरी कर आपका साथ दूंगा। आपकी सभी तकलीफों को दूर कर दूंगा। पर वह कामर्स पढ़ने लगा। वह अपना सपना पूरा करे, इसके पहले ही वह चल बसा। उसका जन्म दिन 6 दिसम्बर है, पर उसकी मौत 11 नवम्बर को हो गई। आज भी उस काली रात को याद करते हैं, तो हम सब सिहर जाते हैं। मरना था कुकरी को, मर गया मेरा पोता। हमने तो अपना चिराग खोया है, इस गेंगवार में। ईश्वर ऐसे दिन किसी को न दिखाए। 09_1477984330

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