
RTI का परिचय
सूचना का अधिकार (RTI) एक महत्वपूर्ण कानून है जो नागरिकों को सरकार से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है। इसे 12 अक्टूबर 2005 को लागू किया गया था और इसका मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना है। RTI के माध्यम से, भारतीय नागरिक किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण से सूचना मांग सकते हैं, जिससे वे सरकारी कार्यों की निगरानी कर सकें। इस कानून के तहत, हर सार्वजनिक प्राधिकरण को एक निर्धारित समय सीमा के भीतर सूचनाएँ प्रदान करनी होती हैं, जिससे नागरिकों को अपनी आवश्यक जानकारियाँ समय पर मिल सकें।
RTI के अंतर्गत केवल सरकारी संस्थाओं और उनके अधिकारियों से जानकारी मांगी जा सकती है। यह कानून किसी भी प्रकार की सूचना, जैसे कि सरकारी नीतियों, अदालती निर्णयों, या विकास कार्यों की प्रगति से संबंधित जानकारी, मांगने की अनुमति देता है। इसका महत्व इस बात में भी निहित है कि यह नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करता है और उन्हें यह समझने में मदद करता है कि सरकार उनकी आवश्यकताओं के प्रति कितनी संवेदनशील है।
RTI का उपयोग करके, नागरिक अपनी आवाज उठा सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि सरकार उनकी अपेक्षाओं का सम्मान करे। यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जो संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त है और इसका उद्देश्य सरकारी पारदर्शिता को बढ़ावा देना है। वर्तमान समय में, RTI ने लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। RTI के तहत अधिकारों का प्रयोग करते हुए, नागरिक न केवल अपनी जानकारियों का अधिकार प्राप्त करते हैं, बल्कि वे सरकार को जवाबदेह बनाए रखने का भी प्रयास करते हैं।
RTI कानून का उल्लंघन
भारत में सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम का उल्लंघन, सरकारी प्राधिकारियों द्वारा जानकारी को छिपाने या प्रदान करने में असमर्थता के रूप में देखा जाता है। जब जानबूझकर आवश्यक जानकारी की आपूर्ति नहीं की जाती है, तो यह उल्लंघन कानून का गंभीर अपराध है। RTI के तहत, हर भारतीय नागरिक को सरकारी सूचनाओं तक पहुँच प्राप्त है; इसके बावजूद, कुछ संस्थाएं या अधिकारी इन कानूनी मानकों का पालन करने में असफल होते हैं।
कई बार, RTI कानून के उल्लंघन के विभिन्न रूप सामने आते हैं जैसे कि समय पर सूचना प्रदान नहीं करना, जानकारी को अपूर्ण या भ्रामक तरीके से पेश करना, या फिर आवश्यकताओं के बिना यह बताना कि मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं है। अधिकतर मामलों में, यह असंवेदनशीलता, लापरवाही, या जानबूझकर सूचना को छिपाने की प्रवृत्ति के कारण होता है। ऐसे कार्यों से न केवल आवेदक को परेशानी होती है, बल्कि यह सूचना के अधिकार की सही भावना का भी उल्लंघन करता है।
RTI कानून का उल्लंघन करने के परिणाम भी गंभीर होते हैं। कानून के तहत, अगर कोई अधिकारी जानबूझकर सूचना देने से मना करता है, तो उसे दंडित किया जा सकता है। इसके अलावा, आवेदक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए अपीलीय तंत्र का उपयोग करने का अधिकार होता है, जिससे अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित होती है। इस तरह के दुरुपयोग से सत्ता के भष्टाचार और पारदर्शिता की कमी बढ़ सकती है, जो हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करता है।
इसलिए, RTI कानून और इसके पालन का महत्व अत्यधिक है, और उल्लंघन की ऐसी स्थिति में, आवेदकों को अपनी आवाज उठाने का हक और साधन दोनों उपलब्ध हैं। यह प्रक्रिया न केवल व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करती है, बल्कि पूरे समाज के लिए जानकारी की स्वतंत्रता को भी सुनिश्चित करती है।
सूचना के रोके जाने के कारण
सूचना को रोकने के विभिन्न कारण होते हैं, जो किसी भी प्रशासनिक या कानूनी प्रणाली में कार्यात्मकता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक होते हैं। सबसे पहले, संवेदनशील जानकारी एक प्रमुख कारक है। संवेदनशील जानकारी, जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित सूचनाएँ, व्यक्तिगत डेटा, या व्यावसायिक गुप्त जानकारी, रोके जाने का एक आम कारण होती हैं। यह आवश्यक है कि इस तरह की जानकारी का उचित सुरक्षा सुनिश्चित की जाए ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि वही जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होनी चाहिए।
इसके अलावा, सुरक्षा कारण भी जानकारी रोके जाने का एक प्रमुख कारण है। कभी-कभी, यदि सूचना को सार्वजनिक किया जाता है, तो इससे व्यक्तिगत, सामूहिक या राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई ऐसी जानकारी उपलब्ध कराई जाए जो आतंकवादियों या अन्य अपराधिक तत्वों को लाभ पहुँचा सके, तो इसे रोकना आवश्यक हो जाता है। सुरक्षा उपायों के तहत भी कई तरह की सूचनाएँ डिफेंस विभाग या अन्य सरकारी एजेंसियों द्वारा नियंत्रित की जाती हैं।
इसके साथ ही, जवाबदेही के डर के कारण भी कई बार सूचना को रोकने का निर्णय लिया जाता है। जब कोई स्थिति या कार्यवाही सार्वजनिक होती है, तो इससे संबंधित अधिकारियों या संस्थाओं द्वारा जवाबदेही बढ़ जाती है। ऐसे समय में, यदि उन्हें लगता है कि जानकारी का खुलासा उनके लिए अनुकूल नहीं होगा या उनकी छवि को नुकसान पहुँचा सकता है, तो वे जानकारी को छिपाने का प्रयास कर सकते हैं। प्रशासनिक दृष्टिकोण से, यह समझना महत्वपूर्ण है कि कैसे ये कारण एक प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं और सूचना के अधिकार के अनुपालन में बाधाएँ उत्पन्न कर सकते हैं।
कानूनी विकल्प
यदि किसी आवेदक की सूचना रोक दी जाती है, तो उसके पास कई कानूनी विकल्प हैं, जिनका उपयोग कर वह अपनी अधिकारों की रक्षा कर सकता है। सबसे पहले, आवेदक को अधिकार है कि वह सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत अपील करें। अपील प्रक्रिया में, आवेदक को पहले अपीलीय प्राधिकरण से संपर्क करना होगा, जो मुख्य सूचना अधिकारी (CIO) के निर्णयों की समीक्षा करता है। यह प्रक्रिया कानून के अनुसार निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरी की जानी चाहिए, जिससे आवेदक को त्वरित समाधान प्राप्त हो सके।
यदि अपीलीय प्राधिकरण द्वारा भी सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो अवहेलना और अन्य कानूनी उपायों के लिए आगे की कार्रवाई की जा सकती है। आवेदक सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में भी याचिका दायर कर सकता है। यह याचिका न केवल सूचना के लिए होती है, बल्कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग भी कर सकती है। न्यायालय में याचिका दायर करने के दौरान सभी प्रासंगिक दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी है, जिससे न्यायालय आवेदक के मामले को उचित रूप से सुन सके।
इसके अतिरिक्त, आवेदक शिकायत दर्ज करने का विकल्प भी चुन सकता है। आवेदक सूचना आयोग में शिकायत दर्ज करा सकता है, जिसमें उसकी समस्या, अधिकारी की लापरवाही, और संबंधित तथ्यों का उल्लेख किया जाएगा। यह आयोग की जिम्मेदारी होती है कि वह मामला सुने और उचित कार्रवाई करे। जब आवेदनकर्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उनके पास उचित सलाह और सहायता प्राप्त करने के लिए कानूनी पेशेवरों से संपर्क करने का विकल्प भी उपलब्ध होता है। यह कदम आवेदक को उनके अधिकारों को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है।
अधिकारियों की जिम्मेदारी
सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत, सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि वे उचित जानकारी को समय पर और सही तरीके से आवेदकों को प्रदान करें। इस कानून का उद्देश्य पारदर्शिता और सरकारी क्रियाकलापों में जवाबदेही सुनिश्चित करना है। इसलिए, यह आवश्यक है कि सभी सार्वजनिक प्राधिकरण और सरकारी विभाग अपने कार्यों में इन जिम्मेदारियों को गंभीरता से लें। वे न केवल जानकारी के लिए आवेदनों का उचित जवाब देने के लिए जिम्मेदार होते हैं, बल्कि उन्हें यह सुनिश्चित करना होता है कि जानकारी को रोकने का कोई कारण न हो।
अधिकारियों को जानकारी देने में अनावश्यक विल में सुधार करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए। अगर कोई अधिकारी जानकारी उपलब्ध कराने में विफल रहता है, तो इसके परिणामस्वरूप उस पर दंड लगाया जा सकता है। जैसा कि RTI अधिनियम में उल्लेखित है, अधिकारी जो इस कानून का उल्लंघन करते हैं, उन्हें अपने कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जा सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अधिकारियों को सभी आवेदनों को गंभीरता से लेना आवश्यक है और उन्हें समयसीमा के भीतर सही जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए।
महत्वपूर्ण यह है कि अधिकारी नागरिकों की जानकारी के हक को समझें और उनकी चिंताओं का सम्मान करें। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर आवेदक को उसकी मांग के अनुसार सही और सटीक जानकारी उपलब्ध कराई जाए। सच्ची जवाबदेही, पारदर्शिता, और जनहित में कार्य करते हुए अधिकारियों के कर्तव्य को निर्वाहन करना अत्यंत आवश्यक है। अगर अधिकारी इस दिशा में अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हैं, तो RTI का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सकता है, जिससे नागरिकों का विश्वास सरकार में बढ़ता है।
अलग-अलग मामलों के उदाहरण
सूचना का अधिकार (RTI) एक महत्वपूर्ण कानून है, जो नागरिकों को सरकारी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है। हालांकि, कई बार इस अधिकार का उल्लंघन किया जाता है। यहां कुछ वास्तविक जीवन के उदाहरण दिए गए हैं, जो बताते हैं कि कैसे विभिन्न मामलों में सूचना रोकी गई और इसके परिणाम क्या रहे।
एक मामला जो ध्यान खींचता है, वह है एक सामाजिक कार्यकर्ता का, जिसने अपने शहर के नगरपालिका के कामकाज के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए RTI आवेदन प्रस्तुत किया। उसके आवेदन का सही तरीके से जवाब नहीं दिया गया, और आवश्यक जानकारी प्रदान करने में जानबूझकर देरी की गई। ऐसे में सामाजिक कार्यकर्ता ने अपील की और अंततः उन्हें जानकारी प्राप्त हुई। इस मामले में यह स्पष्ट हुआ कि जब संबंधित अधिकारियों ने जानकारी रोकने का प्रयास किया, तो कानून ने आवेदक का समर्थन किया और उन्हें अंततः अपनी जानकारी मिली।
दूसरा मामला एक शिक्षा संस्थान का है। एक छात्र ने RTI के माध्यम से अपनी परीक्षा के परिणामों के बारे में जानकारी मांगी। लेकिन उसे सूचना देने के बजाय, संस्थान ने विभिन्न बहानों का सहारा लिया और जानकारी देने में असफल रहा। छात्र ने इस मामले को संज्ञान में लिया और एक शिकायत दर्ज की। अंततः, विभाग को अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ी और उसे जानकारी प्रदान करनी पड़ी। यह मामला यह दर्शाता है कि शिक्षा संबंधी संस्थानों में भी RTI के उल्लंघन की घटनाएँ होती हैं।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि RTI का उल्लंघन विभिन्न क्षेत्रों में हो सकता है, चाहे वह स्थानीय प्रशासन हो या शिक्षा से जुड़ी संस्थाएँ। यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और कानून का सहारा लें, तो उन्हें आवश्यक जानकारी प्राप्त करने में सफलता मिल सकती है। यह संकेत देता है कि कानून आवेदक के पीछे खड़ा होता है जब उनकी सूचना रोकी जाती है।
आवेदकों के अनुभव
सूचना का अधिकार (RTI) कानून ने भारत में नागरिकों को सरकारी सूचनाओं तक पहुंच प्राप्त करने का एक प्रभावी साधन प्रदान किया है। हालांकि, आवेदकों की यात्रा अक्सर उतार-चढ़ाव से भरी होती है। कई आवेदक सफलतापूर्वक सूचना प्राप्त करने में सफल होते हैं, जबकि अन्य को विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
उदाहरण के लिए, एक आवेदक ने RTI के माध्यम से सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक सुविधाओं की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया। प्रारंभ में, उन्हें अपने आवेदन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। परंतु, लगातार अनुसरण और सही मार्गदर्शन के बाद, उन्हें आवश्यक जानकारी मिली, जिसने उस स्कूल की स्थिति को उजागर किया। यह अनुभव उनके लिए न केवल जानकारी प्राप्त करने का, बल्कि अधिकारों के प्रति जागरूक होने का भी एक सबक था।
वहीं, कुछ आवेदकों को विशेष रूप से चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। एक उदाहरण में, एक आवेदक ने सरकारी कार्यालय से दस्तावेज मांगे, लेकिन उन्हें सूचनाएं प्रदान नहीं की गईं। इस स्थिति में, आवेदक को अपीलीय प्रक्रिया का सहारा लेना पड़ा। यह अनुभव इस बात का संकेत है कि कैसे सूचना को रोकना कभी-कभी आवेदकों के लिए एक बड़ा बाधा बन सकता है।
आवेदन करने के बाद, कई आवेदक सलाह देते हैं कि दस्तावेजों और सूचनाओं के आधिकारिक रिकॉर्ड की सही जानकारी के साथ आवेदन करें। इस प्रकार कानून आवेदक के साथ खड़ा होता है, जब सूचना रोकी जाती है। आवेदकों का यह अनुभव केवल व्यक्तिगत कथाएँ नहीं हैं, बल्कि एक समग्र दृष्टिकोण है जो भारतीय समाज में सूचना के अधिकार के महत्व को दर्शाता है।
समाज में RTI का महत्व
सूचना का अधिकार (RTI) भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो नागरिकों को सरकारी जानकारी प्राप्त करने का एक कानूनी साधन प्रदान करता है। RTI अधिनियम, 2005 में लागू होने के बाद से, यह सुनिश्चित किया गया है कि सरकार की कार्रवाई पारदर्शी और उत्तरदायी हो। नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने में RTI का योगदान अतुलनीय है, क्योंकि यह उन्हें सरकारी कार्यों में भाग लेने और उनके प्रति जिम्मेदार बनाने में मदद करता है।
RTI का उद्देश्य सरकारी विभागों और संस्थाओं के कार्यों में पारदर्शिता लाना है। जब नागरिक किसी विभाग से सूचना मांगते हैं, तो वह विभाग सूचना देने के लिए बाध्य होता है। यह प्रक्रिया न केवल सरकारी कार्यों की जांच करने में मदद करती है, बल्कि संभावित भ्रष्टाचार की पहचान करने में भी सहायक होती है। यदि किसी सरकारी विभाग द्वारा सही जानकारी नहीं दी जाती है, तो नागरिक उस विभाग के खिलाफ अपील कर सकते हैं, जिससे जवाबदेही की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।
इस प्रकार, RTI कानून केवल सूचना प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि यह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने का एक महत्वपूर्ण उपकरण भी है। ऐतिहासिक रूप से, RTI ने कई मामलों में समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाए हैं। इससे सरकारी मामलों में पारदर्शिता को बढ़ावा मिला है, जिससे सामान्य जन के प्रति नीतियों और योजनाओं के कार्यान्वयन में सुधार हुआ है। RTI ने नागरिकों को यह अधिकार दिया है कि वे न केवल जानकारी मांग सकें, बल्कि अपनी आवाज भी उठा सकें, जो कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
भविष्य की दिशा
सूचना के अधिकार (RTI) कानून ने भारतीय नागरिकों को सरकारी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की एक नई उम्मीद दी है। हालांकि, इस कानून के भविष्य को लेकर कई चुनौतियां और सुधारों की आवश्यकता पर चर्चा की जा रही है। सबसे पहले, प्रणाली की प्रभावशीलता को सुनिश्चित करना आवश्यक है ताकि सूचना का खुलासा सही समय पर और गुणवत्ता के साथ किया जा सके। कार्यवाही में तेजी लाना और प्रक्रिया को सरल बनाना, RTI कानून के माध्यम से लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अनिवार्य है।
दूसरी ओर, सूचना के अधिकार का दुरुपयोग एक बढ़ती हुई चिंता का विषय है। कई बार, लोग व्यक्तिगत या संवेदनशील जानकारी के लिए आवेदन करते हैं, जिससे उनके और दूसरों के अधिकारों का हनन हो सकता है। इस संदर्भ में, कानून में सुधार की आवश्यकता है ताकि ऐसे मामलों का सही तरीके से निपटारा किया जा सके, और सही जानकारी की अधिकारिता को सुरक्षित किया जा सके।
सरकारी उपायों का पालन करना भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। प्रभावी और सक्षम तंत्र की स्थापना से RTI आवेदकों को अधिक सहारा मिल सकता है। इसके अलावा, सरकारी संगठनों का प्रशिक्षण और जन जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन जानकारी प्राप्त करने के अधिकारों के प्रति आम जनता को संवेदनशील बनाने में मदद कर सकता है।
सोशल मीडिया और तकनीकी इनोवेशन भी RTI प्रक्रिया को सरल और अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकते हैं। ऑनलाइन आवेदन पत्र, सूचना के लिए ट्रैकिंग प्रणाली और मोबाइल एप्लिकेशन जैसे उपाय RTI के उपयोगकर्ताओं के लिए सुविधा की संस्कृति को बढ़ावा देने में सहायक हो सकते हैं।
(CIC, High Court एवं Supreme Court के आवेदक-पक्षीय न्यायिक निर्देशों के आलोक में) सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 किसी अधिकारी की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि नागरिक की शक्ति के लिए बनाया गया कानून है। इसके बावजूद आज भी लोक सूचना अधिकारी सूचना को रोकना, टालना या भ्रामक उत्तर देना अपना विशेषाधिकार समझ बैठे हैं।
परंतु न्यायपालिका का रुख इस विषय में लगातार और स्पष्ट रहा है—जहाँ सूचना रोकी जाती है, वहाँ कानून आवेदक के साथ खड़ा होता है।
Supreme Court : नागरिक का जानने का अधिकार सर्वोपरि सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह दोहराया है कि RTI किसी विभागीय कृपा का विषय नहीं है।
🔹 State of U.P. v. Raj Narain (1975) SC ने ऐतिहासिक रूप से कहा— “लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार क्या कर रही है।”यह निर्णय आज भी RTI कानून की रीढ़ माना जाता है और पूर्णतः नागरिक-पक्षीय है।
🔹 S.P. Gupta v. Union of India (1981) न्यायालय ने स्पष्ट किया कि open government लोकतंत्र का मूल तत्व है और
गोपनीयता अपवाद है, नियम नहीं।
🔹 Manohar Lal Sharma v. Union of India (RTI से जुड़े अवलोकन) SC ने कहा कि सूचना से इनकार तभी संभव है जब वह कानूनन अपवाद में स्पष्ट रूप से आती हो—अन्यथा सूचना देना बाध्यकारी है।
सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत RTI में देरी या अस्वीकार = नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन Central Information Commission (CIC) : आवेदक को केंद्र में रखकर निर्णय CIC के अधिकांश निर्णायक आदेश यह स्थापित करते हैं कि:_
🔹 Bhagat Singh v. CIC & Ors. (CIC में उद्धृत, बाद में HC द्वारा अनुमोदित सिद्धांत) “सूचना रोकने का भार लोक प्राधिकार पर है, न कि सूचना माँगने वाले नागरिक पर।”
🔹 CIC के निरंतर निर्णय (2023–2025) “रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं” कहना तब तक स्वीकार्य नहीं जब तक रिकॉर्ड के नष्ट होने/अस्तित्वहीन होने का विधिवत प्रमाण न हो अधूरी या भ्रामक सूचना देना, सूचना न देने के समान है
🔹 CIC का स्थापित सिद्धांत यदि मामला प्रथम व द्वितीय अपील तक पहुँचा—
➡️ यह स्वयं में PIO की विफलता का प्रमाण है
➡️ और दंडात्मक कार्रवाई का आधार बनता है
➡️ CIC का झुकाव स्पष्ट रूप से आवेदक-पक्षीय है, न कि प्रशासन-संरक्षक।
High Court : RTI नागरिक का औज़ार, अधिकारी की ढाल नहीं उच्च न्यायालयों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि RTI अधिनियम को कमजोर करने की कोई भी कोशिश अस्वीकार्य है।
🔹 Delhi High Court – J.P. Agrawal v. Union of India (2011) HC ने कहा—PIO व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी है। यह तर्क स्वीकार्य नहीं कि “विभाग ने सूचना नहीं दी।”यह निर्णय स्पष्ट रूप से RTI आवेदक के अधिकारों की रक्षा करता है।
🔹 Bombay High Court – RTI matters (आवेदक-पक्षीय अवलोकन) अदालत ने माना कि— RTI अधिनियम का पालन न करना
➡️ serious misconduct है
➡️ और नागरिक को न्याय पाने का अधिकार है।
🔹 Rajasthan High Court के निर्णयों का स्थापित रुझान यदि FAA, PIO की गलती को ढँकने का प्रयास करता है, तो वह भी समान रूप से दोषी माना जाएगा।
अब IPC नहीं, BNS :आवेदक के अधिकार को आपराधिक संरक्षण RTI उल्लंघन अब केवल जुर्माने का विषय नहीं रहा। BNS लागू होने के बाद आवेदक का कानूनी संरक्षण और मजबूत हुआ है।
IPC 166 → BNS धारा 198 लोकसेवक द्वारा जानबूझकर कर्तव्य उल्लंघन कर आवेदक को मानसिक/आर्थिक क्षति पहुँचाना।
IPC 166A → BNS धारा 199 कानूनन आवश्यक कार्य (RTI सूचना देना) न करना।
IPC 175 → BNS धारा 221 सूचना/दस्तावेज जानबूझकर न देना।
IPC 188 → BNS धारा 223 FAA / CIC / SIC के आदेशों की अवहेलना।
निष्कर्ष : अब तराजू एक तरफ़ा नहीं CIC, High Court और Supreme Court—तीनों का संयुक्त संदेश स्पष्ट है:
RTI आवेदक याचक नहीं, अधिकार-धारक है। सूचना रोकना अब प्रशासनिक गलती नहीं,बल्कि संवैधानिक और आपराधिक उल्लंघन है।
Legal Ambit का स्पष्ट मत है कि अब अपीलों में उलझाने की संस्कृति समाप्त होनी चाहिए औरजहाँ आवश्यक हो—सीधी विधिक कार्यवाही की जाए।
✍️ Adv.महावीर पारीक,Legal_Ambit_जागरूकता



