सूरत के नासीरनगर डिमोलिशन मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने SMC कमिश्नर और स्टैंडिंग कमेटी चेयरमैन से जवाब मांगा। अगली सुनवाई 27 नवंबर को।
सूरत | क्रांति समय
सूरत के नासीरनगर डिमोलिशन मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत महानगरपालिका (SMC) के रुख पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने नगर निगम आयुक्त राजकुमार बेनीवाल और स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया है कि प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक आवास देने के आश्वासन से पीछे हटने पर उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न की जाए।
23 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि जब राज्य के एडवोकेट जनरल के माध्यम से प्रभावित लोगों को वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया था, तो नगर निगम ने अपना रुख क्यों बदल दिया?
अदालत ने इस बदलाव को प्रथम दृष्टया गंभीर मानते हुए अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल उठाए। मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
‘प्रभावित लोग मवेशी नहीं, जिन्हें गौशाला में रख देंगे’
सुनवाई के दौरान अदालत ने विस्थापित परिवारों की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत की टिप्पणी का आशय था कि जिन लोगों के घर तोड़े गए हैं, वे आखिर कहां रहेंगे? क्या उन्हें खुले आसमान के नीचे रात बिताने के लिए छोड़ दिया जाएगा? क्या वे देश के नागरिक नहीं हैं और क्या उनके अधिकार नहीं हैं?
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रभावित लोग मवेशी नहीं हैं, जिन्हें उठाकर गौशाला में रख दिया जाए।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने डिमोलिशन के बाद प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और वैकल्पिक आवास की व्यवस्था को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
अधिकारियों से सवाल- कर्मचारियों की कथित अनियमितताओं की जिम्मेदारी कौन लेगा?
अदालत ने नगर निगम आयुक्त और स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन से पूछा कि यदि डिमोलिशन की कार्रवाई में कर्मचारियों की ओर से अनियमितताएं हुई हैं, तो उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक व्यवस्था देने का आश्वासन दिए जाने के बाद नगर निगम अपने रुख से पीछे क्यों हट रहा है।
मामले में याचिकाकर्ताओं ने डिमोलिशन की वैधता और अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आना अभी बाकी है।
प्रधानमंत्री आवास योजना की प्रतीक्षा सूची का तर्क
सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से प्रधानमंत्री आवास योजना में लंबी प्रतीक्षा सूची और प्रभावित लोगों को आवास आवंटित करने के लिए विशेष नीति नहीं होने का तर्क सामने आया।
अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि जब वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया जा चुका था, तो बाद में यह कहकर पीछे कैसे हटा जा सकता है कि ऐसी स्थिति के लिए कोई योजना मौजूद नहीं है?
हाईकोर्ट ने अधिकारियों को अपने बदले हुए रुख के पीछे के कारण स्पष्ट करने के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया।
निजी तीसरे पक्ष की भूमिका पर भी उठे सवाल
नासीरनगर डिमोलिशन मामले में याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई और इसमें किसी निजी तीसरे पक्ष की भूमिका हो सकती है।
याचिका में यह आशंका भी जताई गई कि मकानों को हटाने से संबंधित निजी पक्ष को लाभ मिल सकता है। हालांकि, इस आरोप को अभी सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। मामले की न्यायिक जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही इसकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
हाईकोर्ट ने मामले को असाधारण बताते हुए अधिकारियों के आचरण और अदालत के समक्ष दिए गए आश्वासन से पीछे हटने के मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
27 नवंबर को फिर अदालत में पेश होंगे अधिकारी
हाईकोर्ट ने नगर निगम आयुक्त और स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक आवास देने के आश्वासन से पीछे हटने का निर्णय क्यों लिया गया और उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न की जाए।
अदालत ने आदेश पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की, हालांकि संबंधित आदेश को चुनौती देने की छूट दी गई है।
क्या है नासीरनगर डिमोलिशन विवाद?
सूरत में वेड दरवाजा के पास नासीरनगर क्षेत्र में मई 2026 के दौरान भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच मकानों को ध्वस्त करने की कार्रवाई की गई थी। इसके बाद प्रभावित परिवारों ने कार्रवाई की वैधता और पुनर्वास को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया।
मामले में मुख्य सवाल यह है कि डिमोलिशन की कार्रवाई के दौरान कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं और जिन परिवारों के मकान पूरी तरह ध्वस्त हुए, उन्हें वैकल्पिक आवास कैसे उपलब्ध कराया जाएगा।
अब हाईकोर्ट की निगाह इस बात पर है कि नगर निगम अपने पहले के आश्वासन से पीछे क्यों हटा और प्रभावित परिवारों के आवास के मुद्दे पर जिम्मेदारी किसकी बनती है।
27 नवंबर की सुनवाई में अधिकारियों के जवाब और अदालत के अगले निर्देश इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।










